छठ पूजा साल में दो बार होती है। एक कार्तिक शुक्ल षष्ठी को जिसे डाला छठ कहते हैं और एक होली के कुछ दिन बाद जिसे चैती छठ कहते हैं। उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ती है और छठ में निर्जल व्रत रखना पड़ता है। डाला छठ के समय ठंड की शुरूआत हो जाती है। चैती छठ के समय गर्मी की शुरूआत होती है। इसलिए उत्तर भारत में डाला छठ का ही अधिक प्रचलन है क्योकि इस मौसम में निर्जल व्रत असहनीय नहीं होता ।
शाक्य द्वीपी ब्राहमण सूर्य उपासक थे। उनको स्थानीय राजाओं ने निमंति्रत किया और इससे छठ पूजा की परंपरा प्रारंभ हुर्इ। ऋग-वेद में सूर्य पूजा के जिन नियमों का उल्लेख मिलता है छठ पूजा वैसे ही होती है। महाभारत के अनुसार द्रौपदी ने भी इसी तरह से सूर्य उपासना की थी जिसका फल भी उसे मिला। एक मत यह भी कहता है कि सूर्य पुत्र कर्ण ने इस पूजा की शुरूआत की थी।
शाक्य द्वीपी ब्राहमण सूर्य उपासक थे। उनको स्थानीय राजाओं ने निमंति्रत किया और इससे छठ पूजा की परंपरा प्रारंभ हुर्इ। ऋग-वेद में सूर्य पूजा के जिन नियमों का उल्लेख मिलता है छठ पूजा वैसे ही होती है। महाभारत के अनुसार द्रौपदी ने भी इसी तरह से सूर्य उपासना की थी जिसका फल भी उसे मिला। एक मत यह भी कहता है कि सूर्य पुत्र कर्ण ने इस पूजा की शुरूआत की थी।

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